रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर

विगत लगभग छः दशक पूर्व उपग्रहीय रिमोट सेन्सिंग तकनीक का प्रादुर्भाव हुआ तथा अन्य विकसित देशों के साथ ही भारत में भी रिमोट सेन्सिंग जैसी नवीनतम तकनीक का उपयोग किया जाने लगा। वर्ष 1981 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सम्पूर्ण देश में अग्रणी स्थान प्राप्त करते हुए प्रदेश स्तर का प्रथम रिमोट सेन्सिंग एप्लीकेशन्स सेन्टर लखनऊ में स्थापित करने का निर्णय लिया। 14 मई, 1982 में इस केन्द्र की स्थापना एक स्वयात्तशासी संस्था के रूप में हुई। उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश स्तर का पहला रिमोट सेन्सिंग एप्लीकेशन्स सेन्टर लखनऊ में इस आशय से स्थापित किया था कि नवीनतम उपग्रहीय एवं वायुवीय रिमोट सेन्सिंग तकनीक तथा पारम्परिक तकनीकों के समन्वय से प्रदेश के विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों सम्बन्धी अध्ययन किए जायें। अपनी स्थापना के तुरन्त बाद से ही रिमोट सेन्सिंग एप्लीकेशन्स सेन्टर, उत्तर प्रदेश ने प्रदेश के समस्त प्राकृतिक संसाधनों की समुचित खोज एवं सुनियोजित प्रबन्धन हेतु नवीनतम रिमोट सेन्सिंग तकनीक द्वारा बहुमूल्य आंकड़े सृजित किए जिससे प्रदेश शासन के विभिन्न उपयोगकर्ता विभाग लाभान्वित हुए हैं।

विगत 37 वर्षों के अपने कार्यकाल में रिमोट सेन्सिंग एप्लीकेशन्स सेन्टर, उ0प्र0 द्वारा वायुवीय, उपग्रहीय तथा पारम्परिक तकनीकों के समन्वय से प्रदेश के विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों सम्बन्धी अध्ययन करके बहुमूल्य आंकड़े सृजित किये जाते रहे हैं, जिससे उपयोगकर्ता विभाग लाभान्वित हो सके हैं। सम्पूर्ण प्रदेश में भूगर्भीय प्राकृतिक सम्पदा की खोज, जल संसाधनों के सुनियोजित उपयोग हेतु समुचित अध्ययन, कृषि एवं मृदा, भूमि उपयोगिता एवं नगरीय सर्वेक्षण, वन सम्पदा में बढ़ोत्तरी, गांव स्तर तक पेयजल एवं कृषि योग्य जल उपलब्धता सम्बन्धी अध्ययन तथा प्रमुख नदियों में प्रदूषण निम्नीकरण की दिशा में आंकड़े उपलब्ध कराना इस केन्द्र की प्रमुख गतिविधियाॅ रही है। उक्त के साथ-साथ इस केन्द्र द्वारा वर्ष 2013-14 के शैक्षिणक सत्र से केन्द्र परिसर में ही अखिल भारतीय प्राविधिक शिक्षा परिषद् (ए0आई0सी0टी0ई0), नई दिल्ली से अनुमोदित एवं ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (ए0के0टी0यू0), लखनऊ से सम्बद्ध, 02 वर्षीय एम0टेक0 इन रिमोट सेन्सिंग एण्ड जी0आई0एस0 पाठ्यक्रम का संचालन भी किया जा रहा है।

उद्देश्य

  • रिमोट सेन्सिग तकनीक के माध्यम से समस्त प्राकृतिक संसाधनों का अध्ययन एवं आंकलन ।
  • पर्यावरणीय स्थिति एवं समस्त प्राकृतिक संसाधनों में आये परिवर्तनों का समय-समय पर अनुश्रवण ।
  • विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों संबंधी आंकड़ों का सृजन एवं संकलन ।
  • प्रदेश में सुदूर संवेदन तकनीक के विस्तार एवं उसके उपयोग के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना ।
  • रिमोट सेन्सिग के क्षेत्र में विश्वविद्यालयों एवं अन्य शोध संस्थाओं को वांछित सहयोग प्रदान करना ।
  • रिमोट सेन्सिग अध्ययनों से संबंधित फील्ड सर्वेक्षण करना ।
  • रिमोट सेन्सिग तकनीक एवं उसकी उपयोगिता पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों, सेमिनार आदि का आयोजन ।
  • रिमोट सेन्सिग के क्षेत्र में शोध कार्य का प्रोत्साहन ।
  • राष्ट्रीय एवं अन्र्तराष्ट्रीय संस्थाओं से रिमोट सेन्सिग संबंधी अध्ययनों में सहभागिता ।
  • रिमोट सेन्सिग अध्ययनों पर रिपोर्ट एवं शोध पत्रों का प्रकाशन ।

दृष्टिकोण

इस केन्द्र की स्थापना के प्राथमिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इस केन्द्र द्वारा वायुवीय उपग्रहीय रिमोट सेन्सिग तकनीक तथा पारम्परिक तकनीकों के समन्वय से विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन एवं प्रबंधन में सहयोग प्रदान किया जा रहा है । यह केन्द्र रिमोट सेन्सिग तकनीक तथा वास्तविक उपयोगकर्ता के मध्य एक कड़ी के रूप में कार्यरत है । अपनी स्थापना के समय से ही इस केन्द्र द्वारा विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों जैसे जल संसाधन, भू संसाधन, कृषि एवं मृदा संसाधन, वन संसाधन, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तथा भूमि उपयोगिता एवं नगरीय सर्वेक्षण के क्षेत्रों में बहुमूल्य आंकड़े सृजित किये जाते रहे हैं जिससे विभिन्न उपयोगर्ता विभाग लाभान्वित हुए हैं। विभिन्न उपयोगकर्ता विभागों के साथ सामन्जस्य इस आशय से स्थापित किया गया है कि रिमोट सेन्सिग तकनीक के माध्यम से सृजित आंकड़ों का पूरा-पूरा लाभ उठाया जा सके ।

कार्यान्वयन

केन्द्र की कार्यप्रणाली प्रमुखतः दो प्रारूपों में सम्पादित की गयी है-

  • प्रदेश के विभिन्न उपयोगकर्ता विभागों के अनुरोध पर सम्पादित कार्यों के रूप में
  • केन्द्र द्वारा स्वचालित परियोजनाओं के रूप में।

इन समन्वित प्रयासों से सृजित आंकड़ों को प्रदेश सरकार के विभिन्न उपयोगकर्ता विभागों को लाभान्वित करने के उद्देश्य से, इस केन्द्र द्वारा प्रारम्भ से ही प्रदेश की जल सम्पदा, खनिज, वन एवं कृषि सम्पदा, मृदा, भूमि उपयोगिता एवं नगरीय संरचना सम्बन्धी अध्ययन किये जाते रहे हैं। समयबद्ध रूप से त्रुटिरहित आंकड़ों के सृजन द्वारा समय-समय पर परियोजनाओं को कार्यान्वित करके न केवल प्रदेश सरकार वरन् राष्ट्रीय स्तर की अनेक संस्थाओं एवं विश्व बैंक द्वारा पोषित परियोजनाओं के अन्तर्गत भी कार्य किये जा रहे हैं।प्रदेश सरकार के उपयोगकर्ता विभागों में शनैः-शनैः सुदूर संवेदन की क्षमता एवं उपयोगिता के प्रति जागरूकता बढ़ी है तथा उनके द्वारा प्रेषित अनुरोधों में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी हो रही है।

क्रियाकलापों के क्षेत्र

मई, 1982 में मात्र दो वैज्ञानिकों की जनशक्ति के माध्यम से, एक किराए के भवन में कार्यालय स्थापित कर सुदूर संवेदन उपयोग केन्द्र, उत्तर प्रदेश द्वारा कार्यकलाप आरम्भ किए गए। अपने अथक प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 1989 में केन्द्र द्वारा अपने निजी भवन का निर्माण किया गया तथा वैज्ञानिक जनशक्ति में बढ़ोतरी की गयी। वर्ष 1990 में अपने कार्यकलापों को और भी प्रभावी बनाने के लिए कम्प्यूटर एवं इमेज प्रोसेसिंग प्रयोगशाला का निर्माण किया गया, जो कि वर्तमान में अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित है, जिसमें भौगोलिक सूचना पद्वति (जी0आई0एस) प्रमुख है। अपने कार्यकलापों को समय से एवं प्रभावी रूप से सम्पादित करने के फलस्वरूप उत्तर प्रदेश शासन के सहयोग से आज हमारी वैज्ञानिक जनशक्ति 02 से बढ़कर 28 हो चुकी है। कुल मिलाकर आज केन्द्र के सम्पूर्ण कर्मचारियों की संख्या लगभग 120 हो चुकी है, यह तथ्य केन्द्र के विकास एवं उपयोगिता के द्योतक है।

प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में योगदान हेतु केन्द्र के कार्यकलाप निम्नलिखित संसाधनों के अन्तर्गत केन्द्र के 11 प्रभागों के माध्यम से सम्पादित किये जाते हैं-

  • मृदा एवं कृषि संसाधन
  • जल संसाधन
  • भू संसाधन
  • वन संसाधन, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
  • भूमि उपयोगिता एवं नगरीय संरचना
  • प्राकृतिक संसाधनों सम्बन्धी एकीकृत सर्वेक्षण
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • कम्प्यूटर एवं इमेज प्रोसेसिंग
  • शैक्षणिक कार्यक्रम

केन्द्र के कार्यकलापों के सुचारू रूप से क्रियान्वयन हेतु केन्द्र में अनेक प्रयोगशालाओं आदि को भी विकसित किया गया है। इनमें निम्न प्रयोगशाला प्रमुख है:-

  • कम्प्यूटर इमेज प्रोसेसिंग एवं जी.आई.एस. प्रयोगशाला।
  • मृदा विश्लेषण प्रयोगशाला।
  • जल विश्लेषण प्रयोगशाला।

केन्द्र द्वारा ई-गर्वनेन्स की पद्धति का भी पूर्णतया अनुपालन सुनिश्चित किया जा रहा है। सम्पूर्ण प्रदेश के जनपदवार प्राकृतिक संसाधनों संबंधी आंकड़ों का सृजन कर प्रदेश के नियोजन विभाग के सहयोग से नेशनल इनफारमेटिक्स सेन्टर (एन.आई.सी.) की वेबसाइट एचटीटीपीःध्ध्जीआईएस.यूपी.एनआईसी.इन पर भी उपलब्ध कराए गए हैं। केन्द्र में विभिन्न क्रय संबंधी टेण्डर डाक्यूमेन्ट को भी केन्द्र की वेबसाइट डब्लूडब्लूडब्लू.आरएसएसीयूपी.ओआरजी.इन पर समय-समय पर उपलब्ध कराया जा रहा है। ई-टेण्डरिंग की प्रक्रिया भी वर्तमान में प्रगतिशील है। ई-प्रोक्योरमेन्ट की प्रक्रिया पूर्ण करते हुए जैम के माध्यम से भी विभिन्न सामग्रियों को क्रय किये जाने हेतु वांछित कार्यवाही सम्पादित की जा रही है। प्रदेश सरकार द्वारा माह जनवरी 2016 से क्रियान्वित की गयी समन्वित शिकायत निवारण प्रणाली (आई.जी.आर.एस.) के माध्यम से भी केन्द्र द्वारा अपना योगदान प्रदान किया जा रहा है।

जल संसाधन के क्षेत्र में केन्द्र द्वारा सम्पादित कार्यकलाप:

  • प्रदेश के सूखाग्रस्त (यथा बुन्देलखण्ड, विध्यांचल इत्यादि) एवं अन्य भूमिगत जल विषम क्षेत्रों (यथा आगरा, मथुरा इत्यादि) में भूमिगत जल की खोज तथा ट्यूबवेल/हैण्डपम्प छिद्रण हेतु उपयुक्त स्थलों का चयन।
  • वर्षा ऋतु के दौरान एवं उसके पश्चात् बाढ़ ग्रसित क्षेत्रों का रेखांकन एवं क्षति का आंकलन।
  • भूजल के कृत्रिम रिचार्ज हेतु अध्ययन एवं भूमिगत जल के कृत्रिम भंडारों हेतु स्थलों का चयन।
  • प्रमुख नदियो पर सड़क, रेल पुल निर्माण हेतु नदी के प्रवाह का कालिक अनुश्रवण एवं पुल निर्माण हेतु उचित स्थल का चयन।
  • वर्षा जल संरक्षण हेतु उचित स्थलों का चयन
  • प्रमुख नहर प्रणालियों के समावेश क्षेत्रों में जल प्लावन की समस्या संबंधी अध्ययन।
  • प्रदेश में अधिक आर्द्रता वाले क्षेत्रों तथा जलाशयों का चिन्हीकरण तथा मानचित्रीकरण।
  • प्रदेश की प्रमुख नदियों के प्रवाह में आये कालिक परिवर्तनों का अनुश्रवण।
  • सम्पूर्ण प्रदेश में भूजल उपलब्धता के आकंलन हेतु जनपदवार हाइड्रोजियोमार्फोलाॅजिकल मानचित्रीकरण।
  • भूमिगत जल, जलाशयों एवं नदी समूहों में जल की गुणवत्ता संबंधी अध्ययन।
  • हिमालय क्षेत्र में हिम आच्छादित क्षेत्रों का अध्ययन तथा उत्पत्त प्रमुख नदियो में ग्रीष्म काल में आने वाले जल की मात्रा का पूर्वानुमान।

कृषि संसाधन के क्षेत्र में केन्द्र द्वारा सम्पादित कार्यकलाप:

  • गेहूं, धान, सरसों एवं गन्ने की खेती की कटान के पूर्व क्षेत्रफल एवं उपज संबंधी पूर्वानुमान।
  • देश के आठ पूर्वी प्रदेशों में धान के पर्यावरण संबंधी अध्ययन।
  • डेवलपमेंट ऑफ क्रॉप वेदर यील्ड मॉडल फॉर डिफरेंट एग्रो क्लाइमेटिक जोन ऑफ यू0पी0
  • फसल के क्षेत्रफल के पूर्वानुमान में राडारसेट डाटा का उपयोग।
  • ओलावृष्टि से गेहूं की फसल को हुई क्षति का आंकलन।
  • हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में विभिन्न बागानों संबंधी अध्ययन।
  • केला, अमरूद एवं आलू की फसल संबंधी अध्ययन।
  • आम एवं आंवला के क्षेत्रफल का पूर्वानुमान।
  • प्रदेश के 24 जनपदों में रेशम विकास हेतु अध्ययन।
  • क्रापिंग सिस्टम एनालिसेस
  • क्रॉप कन्डीशन एसेसमेंट

भूमि उपयोगिताध्भूमि आच्छादन एवं नगरीय संरचना के क्षेत्र में केन्द्र द्वारा सम्पादित कार्यकलाप:

  • प्रदेश के विभिन्न जनपदों में भूमि उपयोगिता, भूमि आच्छादन संबंधी मानचित्रीकरण।
  • प्रदेश के प्रमुख नगरीय क्षेत्रों में नगरीय विस्तार संबंधी मानचित्रीकरण एवं कालिक अनुश्रवण।
  • जी0आई0एस0 मैपिंग फार हाउस प्रापर्टी टैक्स एसेसमेंट
  • अंडमान निकोबार एवं लक्षद्वीप क्षेत्रों में भूमि उपयोगिता संबंधी अध्ययन।

वन संसाधन ,पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के क्षेत्र में केन्द्र द्वारा सम्पादित कार्यकलाप:

  • प्रदेश में वन आच्छादित क्षेत्रों का मानचित्रीकरण एवं क्षेत्रफल का आंकलन।
  • वन आच्छादित क्षेत्रों में आये परिवर्तनों का अध्ययन।
  • वन आच्छादित क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के वनांे, वृक्षों का चिन्हीकरण।
  • वनाग्निग्रसित क्षेत्रों का रेखांकन एवं मानचित्रीकरण।
  • राष्ट्रीय वन्य प्राणी उद्यानों में चारागमों एवं जल श्रोतों का मूल्यांकन।
  • वन क्षेत्रों के ह्रास के कारणों का मूल्यांकन।
  • वृक्षारोपण हेतु उचित स्थलों का चयन।
  • वृक्षारोपण सामाजिक वानिकी आदि कार्यक्रमों की सफलता का मूल्यांकन।
  • देहरादून, मसूरी क्षेत्र में खनन से पर्यावरण पर हुये दुष्प्रभाव का आंकलन।
  • टेहरी बांध क्षेत्र में पर्यावरण निम्नीकरण संबंधी अध्ययन।
  • नैनीताल जनपद पर्वतीय क्षेत्र में पर्यावरण निम्नीकरण संबंधी अध्ययन।
  • हमीरपुर जनपद में मौदाहा बांध परियोजना क्षेत्र में पर्यावरण संबंधी अध्ययन।
  •   वन प्रभागों की कार्य योजना हेतु स्टाक एवं आयतन समबन्धी अध्ययन।
  •   जैव विविधता और बायोमास सम्बन्धी अध्ययन करना।

मृदा संसाधनों के क्षेत्र में केन्द्र द्वारा सम्पादित कार्यकलाप:

  • प्रदेश में जनपदवार परती भूमि मानचित्रीकरण।
  • प्रदेश के बीहड़ क्षेत्रों का रेखांकन एवं मानचित्रीकरण।
  • प्रदेश में उसर क्षेत्रों का रेखांकन एवं मानचित्रीकरण।
  • ऊसर सुधार कार्यक्रम हेतु खसरावार सूचना का सृजन।
  • ऊसर सुधार कार्यक्रमों का पर्यावरण पर प्रभाव का आंकलन।
  • भूमि की गुणवत्ता में निम्नीकरण के कारणों का अध्ययन।
  • प्रदेश में विभिन्न प्रकार की मृदा क्षेत्रों का मानचित्रीकरण।

भू-संसाधन के क्षेत्र में केन्द्र द्वारा सम्पादित कार्यकलाप:

  • प्रदेश के बुन्देलखण्ड एवं अन्य क्षेत्रों में खनिज सम्पदा की खोज।
  • लघु सीमेन्ट उद्योग हेतु गंगा, गोमती दोआब क्षेत्र में माड़ एवं कंकड़ की खोज।
  • स्थलानुरेख संबंधी अध्ययन।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क निर्माण हेतु उचित स्थलों का चयन।
  • मालपा, उखीमठ, मसूरी, नैनीताल तथा प्रमुख तीर्थ मार्गों पर भू-स्खलन संबंधी अध्ययन।
  • प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में भूकंपीय अध्ययन।
  • प्रमुख नदियों एवं जलाशयों में अवसादीभार की मात्रा संबंधी अध्ययन।
  • प्रमुख नदियों के सन्निकट भू-आकृतियों का रेखांकन एवं मानचित्रीकरण।

प्राकृतिक संसाधनों के एकीकृत सर्वेक्षण संबंधी अध्ययन:

  • प्रदेश के 17 जनपदों के चयनित क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का एकीकृत सर्वेक्षण।
  • प्रदेश के आठ जनपदों में कम्प्यूटरीकृत प्राकृतिक संसाधन आंकड़ा प्रबन्धन प्रणाली का सृजन।
  • प्रदेश के समस्त जनपदों हेतु प्राकृतिक संसाधनों सम्बन्धी सूचना प्रणाली का गठन।
  • उत्तरांचल के टेहरी-गढ़वाल क्षेत्र में बायोजियो डाटाबेस सम्बन्धी अध्ययन।
  • स्पेस बोर्न इन्फारमेशन सिस्टम- डीसेन्ट्रलाइज्ड प्लानिंग (एस0आई0एस0-डी0पी0) का गठन।

अन्य अध्ययन:

  • डिजीटल डाटा बेस फॉर कैडेस्ट्रल रिसोर्स मैपिंग।
  • प्रदेश के प्रमुख शहरों में मलिन बस्तियों एवं उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं का रेखांकन एवं चिन्हीकरण।
  • प्रदेश के चयनित जनपदों में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन प्रणाली का गठन।

प्रशिक्षण कार्यक्रम:

  • प्रदेश सरकार के विभिन्न उपयोगकर्ता विभागों के अधिकारियों एवं प्रमुख विश्वविद्यालयों/कालेज़ों के प्रवक्ताओं/शोध छात्रों हेतु विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन।
  • केन्द्र द्वारा सृजित प्राकृतिक संसाधनों एवं आर्थिक एवं सामाजिक आंकड़ों का डिजीटल डाटाबेस के प्रस्तुतीकरण हेतु चयनित जनपदो में प्रस्तावित एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन।

शैक्षणिक कार्यक्रम

एम.टेक. इन रिमोट सेन्सिंग एण्ड जीआईएस

वर्ष 2013-14 के शैक्षणिक सत्र से केन्द्र द्वारा प्रथम बार एम.टेक. इन रिमोट सेन्सिंग एण्ड जीआईएस (दो वर्षीय पाठ्यक्रम) का शुभारम्भ किया गया। उक्त पाठ्यक्रम प्रदेश के उ0प्र0 प्राविधिक विश्वविद्यालय (यूपीटीयू) से सम्बद्ध है एवं उक्त कार्य हेतु अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद, नई दिल्ली से अनुमोदन भी प्राप्त किया जा चुका है। यूपीटीयू से प्राप्त निर्देशो के क्रम में केन्द्र द्वारा माह अक्टूबर, 2013 से उक्त पाठ्यक्रम का शुभारम्भ किया गया, जिसमें प्रदेश के विभिन्न तकनीकी कालेजो से आए 18 शिक्षार्थी वर्तमान में शिक्षा प्राप्त कर रहे है। वर्ष 2014-15 के शैक्षणिक सत्र में केन्द्र द्वारा माह सितम्बर, 2014 से उक्त पाठ्यक्रम का शुभारम्भ किया गया, जिसमें प्रदेश के विभिन्न तकनीकी कालेजो से आए 13 शिक्षार्थी वर्तमान में शिक्षा प्राप्त कर रहे है।